सोनम वर्मा
सीतापुर उत्तर-प्रदेश

सब कुछ कितना बदल गया।
घर था अब मकान बन गया।
घारी बग्गर उद्यान बन गया।
बैलों का नामोनिशान मिट गया।
गाय हमारी माता थी
उसका अब भाव घट गया।
नहीं परवाह किसी को मां की
इंसानों का ईमान बिक गया।
बड़े बुजुर्गो की चौपाल कहां अब
दादा-दादी की सुने कौन अब
पीढ़ियों का इतिहास
सुकून अौर विश्वास मिट गया।
आग तापने की फुर्सत किसे अब
लकड़ियों के साथ के बिना
वो अलाव भी अब सिमट गया।
बाजरे चने की रोटियां कहां अब
मजबूत हड्डियां कहां बची अब
खान-पान का स्वाद घट गया।
महाकाव्य ग्रंथों में किसे रूचि अब
कोचिंग मोबाइल के चक्कर में
दिन-रात कम पड़ गया।
आधुनिकता के चक्कर में
स्थानीय भाषाओं का व हिन्दी-संस्कृत का
मान-सम्मान घट गया।
पार्टी पब के चक्कर में
हमारा शास्त्रीय संगीत व लोकगीत सिमट गया
ईद मोहर्रम कार्तिक आषाढ़ के मेले का
इंतजार सभी को रहता था
स्वार्थपरक राजनीति की आड़ में
दिलों का प्यार सिमट गया।
आत्मनिर्भर थे गांव हमारे
प्रहार किया विदेशियों ने हमारी सभ्यता पे ऐसा
ग्रामवासी दर-बदर हो गये
चार दानों में जीवन का आधार सिमट गया।
सब कुछ कितना बदल गया।

~सोनम वर्मा
सीतापुर उत्तर-प्रदेश