बीरेंद्र सिंह सेंगर

चंबल बैली पंचनद धाम

जुहीखा औरैया यूपी।

 

*जल संपदा की दृष्टि से देश की सारी नदियां जहरीली हो चुकी हैं*

 

*डा आर के मिश्रा बरिष्ठ पत्रकार दैनिक लोक भारती*

               के साथ

*बीरेंद्र सिंह सेंगर रिपोर्टर चंबल बैली पंचनद धाम की खास पेशकश*

 

जुहीखा जगम्मपुर ।

पंचनद धाम।

भारत की गिनती दुनियां के ऐसे देशों में है, जहां बड़ी तादात में आबादी होने के बावजूद उसी अनुपात में विपुल जल के भंडार अमूल्य धरोहर के रूप में उपलब्ध हैं। जल के जिन अजस्त्र स्रोतों को हमारे पूर्वजों व मनीषियों ने पवित्रता और शुद्धता के पर्याय मानते हुये पूजनीय बनाकर सुरक्षित कर दिया था, आज वहीं ये जल स्रोत हमारे अवैज्ञानिक दृष्टिकोण, आर्थिक दोहन की उद्दाम लालसा, औद्योगिक लापरवाही, प्रशासनिक भ्रष्टाचार और राजनैतिक अदूरदर्शिता के चलते अपना अस्तित्व खो रहे हैं। 

पचनद पर यमुना च॓बल कुंवारी सिंध पहूंज पचधारा (पंचनद)

 जैसी सांस्कृतिक व ऐतिहासिक महत्व की नदियों की बात तो छोड़िये, प्रादेशिक स्तर की क्षेत्रीय नदियां भी गंदे नालों में तब्दील होने लगी हैं। औद्योगिक संयंत्रों से निकले जहरीले रसायनों ने च॓बल कुआरी सिंध पहूंज    क्षेत्र की नदियों के जल को प्रदूषित कर अम्लीय बना दिया है। हाल ही में चंबल नदी में नागदा क्षेत्र में स्थानीय औद्योगिक ईकाइयों द्वारा छोड़े जा रहे जहरीले अपशिष्ट की वजह से प्रदूषित हो जाने की खबर आई है इस कारण जल जीवों का संकट आ गया है।  च॓बल में   पानी जहरीला हो जाने के कारण उसकी कोख में मछलियों की संख्या निरंतर घटती जा रही है। वहीं चंबल सैंचुरी में पल रहे हजारों मगर, घड़ियाल और डांल्फिनों पर दिन पर दिन खतरा बढ़ रहा है जो सैंचुरी विभाग के लिए सर दर्द बन सकता है।

 

 

  प्रकृति की वर्षा की यह देन हमारे लिये एक तरह से वरदान है। लेकिन हम अपने तात्कालिक लाभ के चलते इस वरदान को अभिशाप में बदलने में लगे हुये हैं। औद्योगिक क्षेत्र की  स्टील प्लांट के नाले च॓बल में ही डाल दिए गए हैं अर्थ दोहन की ऐसी ही लापरवाहियों के चलते पानी को 

जहरीला तो बना ही रहे हैं, मनुष्य-मवेशी व अन्य जलीय जीव-जन्तुओं के लिये भी जानलेवा साबित हो रहे हैं। दरअसल इन स्टील संयंत्रों में लोह के तार व चद्दरों को जंग से छुटकारा दिलाने के लिये 32 प्रतिशत सान्द्रता वाले हाइड्रोक्लोरिक अम्ल का इस्तेमाल किया जाता है। तारों और चद्दरों को तेजाब से भरी बड़ी-बड़ी हौदियों में जब तक बार-बार डुबोया जाता है तब तक ये जंग से मुक्त नहीं हो जातीं? बाद में बेकार हो चुके तेजाब को चंबल,  नदी से जुड़े नालों में बहा दिया जाता है। इस कारण नदियों का पानी लाल होकर प्रदूषित हो जाता है, जो जीव-जन्तुओं को हानि तो पहुंचाता ही है यदि इस जल का उपयोग सिंचाई के लिये किया जाता है तो यह जल फसलों को भी पर्याप्त नुकसान पहुंचाता है।  जहरीले रसायन आजू-बाजू की नदियों में बहा रही हैं।ग॓दा पानी पीने से मवेशी मर जाते है। मलबे से नाले का पानी लाल होकर जहरीला हो जाता है। सिंचाई के लिये इस्तेमाल करने पर यह पानी फसलों की जहां पैदावार कम करता है, वहीं इन फसलों से निकले अनाज का सेवन करने पर शरीर में बीमारियां भी घर करने लगती हैं। ग्रामीण हर साल नाले में दूषित मलबा नहीं बहाने के लिये अपनी जुबान खोलते हैं लेकिन खाद कारखाने एवं जिले के आला प्रशासनिक अधिकारियों के कानों में जूं तक नहीं रेंगती? यहां तक कि तटीय वासिंदे भी नदियों में स्नान करने से कतराते हैं।

 उत्खनन के बाद जो मलबा निकलता है उसे सिंध नदी में निःसंकोच बहा दिया जाता है। इससे एक ओर सिंध उथली हो रही है वहीं दूसरी ओर प्रदूषित भी हो रही है और इसकी जल ग्रहण क्षमता भी निरंतर प्रभावित हो रही है। 

दुर्भाग्य से च॓बल यमुना में उद्योगों के गटर खुले होने के कारण तराई पट्टी में संखिया का मानक पांच-सात गुना अधिक है।

 

 संखिया अत्यधिक उभयधर्मी (लवण और क्षार युक्त तत्व है) इसका उपयोग पेंट, कपड़े की छपाई, शीशा उद्योग और कीटनाशक चूहे मारने की दवा में किया जाता है। मानव शरीर में इसकी मात्रा सीमा से अधिक पहुंचने पर रक्त वाहिनियों, दिल और दिमाग को घातक रूप से ग्रस्त करती हैं। संखिया से त्वचा, फेंफड़े और मूत्राशय का भी कैंसर हो सकता है। यह स्थिति यमुना  नदी में अम्लीयता बढ़ने के कारण निर्मित हुई है।

 

 

 *उद्योगों से निकला यह रसायन ग्रामीणों में बीमारियों का कारण भी बन रहा है। पेट में कुपच, त्वचा संबंधी रोग और अल्सर जैसी बीमारियां पैदा करता है*

समय रहते इस पर गहनता के साथ बिचार बिमर्स नहीं किया गया तो निकट भबिस्य में परिणाम ग॓भीर होंगे ।

     सफेद हाथी बने ये कार्यालय कागजी कार्यवाही कर जेबें भरने में लगे हैं। बहरहाल स्थिति भयावह है?